भूटान की मुख्य विशेषता यह है कि यहाँ के बौद्ध  विहार भारी भरकम पत्थरों के विशालकाय भवन हैं , साथ ही ऐसी जगहों पर बने हैं जहां पहुँचना नामुमकिन  है, पहुँचने की कल्पना ही  नहीं की जा सकती, पर फिर भी लोग पहुंचते हैं , इसलिए कल्पना  की सीमा में तो  है।

कल्पना से परे इसलिए भी क्योंकि आठवीं सदी में (आज से १३०० वर्ष पूर्व ) ९०० मीटर ( ३००० फ़ीट ) की ऊँचाई पर , घाटी के किनारे लटकती एक चोटी पर जिसकी समुद्रतल से ऊँचाई ७००० फ़ीट है , बिना किसी मशीन की सहायता के इतने भारी – भारी पत्थरों से विशालकाय भवन का निर्माण कैसे सम्भव हुआ होगा ?

     लोक कथाओं के अनुसार जिस गुरु ने यह स्थान बनवाया था वह शेरनी पर सवार उड़कर यहाँ आया था। इस भवन को देख कर मन इस कहानी पर विश्वास करने के लिए मजबूर हो जाता है। उस युग में, इस उँचाई पर , बद से बदतर मौसम में प्रभु की अनुकम्पा के बिना यह सब सम्भव हो हीं नहीं सकता था  ।

यह है, तक्तसङ्ग भूटान का सर्वप्रसिद्ध बौद्धविहार 'टाईगर्स नेस्ट ' के नाम से भी प्रसिद्ध

    ज्यादातर यात्रियों को यह बताया जाता है कि इस बौद्धविहार के दर्शन के बिना भूटान यात्रा अधूरी है। भूटानियों के लिए यह तीर्थयात्रा के समान है। पारो पहुँचकर हमने टूरिस्ट बन कर घूमने का निश्चय किया

   अगली सुबह सचमुच मजेदार थी , खिली -खिली चमकदार . हमने जॉन की आंटी के रेस्टोरेंट में जमकर भरपेट आलू के पराठे खाये और फिर कार में बैठकर चढ़ाई के पहले पड़ाव तक पहुँच गए .  देवदार के वृक्षों के बीच से होकर जाने वाले रास्ते से हमने अपनी चढ़ाई शुरू की , अत्यंत सुंदर दृश्य बिल्कुल चित्र जैसा . चारों  तरफ बुरांश के फूल बिछे पड़े थे . चढ़ाई की शुरुआत में ज्यादा कठिनाई न हुई , पर जैसे जैसे चढ़ते गए चढ़ाई खड़ी होती गयी , परेशानी बढ़ती गयी . बिना ब्रेक लिए अब आगे बढ़ न पा रहे थे , उधर सूरज देवता बिल्कुल सर पर आ गए थे -हमारी सारी उम्मीदों पर पानी फेरते  नजर आ रहे  थे .

  आधे रास्ते पहुँच कर एक कैफे मिला , हमें वहां बाथरूम भी मिला , साधारण पर साफ सुथरा , प्रयोग में कठिनाई न हुई . वहाँ हमने मोनैस्ट्री के कुछ फोटो भी खींचे , दृश्य खूबसूरत पर चढ़ाई यहां से बहुत ही भयावह नजर आ रही , बिल्कुल असम्भव . यहां से न तो आगे बढ़ने का रास्ता नजर आ रहा था और न ही मोनैस्ट्री का मुख्य द्वार दीखता था . ऐसा लगता था कि एक भवन पहाड़ की चोटी के किनारे पर अटका दिया गया है .

  जब हम इस कैफ़े तक पहुंचे थे तो भूख के मारे बेहाल हो रहे थे .पर दुर्भाग्य से जब हम पहुंचे तो लंच टाइम समाप्त हो चुका था , हमें पानी से ही भूख प्यास मिटानी  पड़ी . पानी भी बहुत महँगा था

जल्दी ही हम मोनैस्ट्री की ओर चल पड़े दिल में शंका लिए कि पहुंचेंगे भी या नहीं कैफ़े के बाद तो एक दम खड़ी चढ़ाई शुरू हो गयी , कुछ स्थानों पर तो खतरनाक भी थी ,  अपने अंगों को सहलाते जाते थे ,बार – बार ब्रेक ले रहे  थे . मन घबरा रहा था , सोचता कि पहुंचेंगे भी या नहीं  ? और तब तो हद ही हो गयी जब हमें बताया गया कि चढ़ाई का सबसे मुश्किल हिस्सा तो अभी बाकी है  . बहुत सारी सीढ़ियों की चढ़ाई जहां हम अभी पहुँचने ही वाले थे .

इधर जॉन लगातार तसल्ली दे रहा था कि भव्य मोनैस्ट्री को देखकर सारी थकान उतर जाएगी अंगों का दुखना भी सब भूल जायेंगे . बस हम  चढ़ते चले गए .

जब हाँफते हुए और गर्मी से बेहाल हम उन सीढ़ीओं के पास पहुँचे जिनकी चर्चा बार बार हो रही थी तो अजीब ही नजारा था . मोनैस्ट्री का रास्ता नीचे उतर कर जाने का था , नीचे भी क्या ? एक दम खड़ी उतराई . ऊपर चढ़ते हुए कुछ यात्री भी नजर आ रहे थे , वो मोनैस्ट्री से लौट रहे थे , गर्मी और थकान से परेशान . एक दो मिनट रुक कर विचार करना पड़ा क्या वापिस लौट चलें ? लौटना भी क्या आसान था ? फिर निश्चय किया कि नहीं मंजिल के पास पहुंच कर लौटना क्यों ? मोनैस्ट्री की तरफ आगे बढ़ चले .

मोनैस्ट्री के द्वार पर पहुँचने से पहले एक ‘शेलकरज़ार ‘ नामक प्रसिद्ध और पवित्र झरना मिला . द्वार पर हमने हवा में लहराते हुए सैंकड़ों झंडे देखे , हमने भी प्रार्थना करते हुए अपना झंडा लगा दिया . प्रार्थना के मंत्र बुदबुदाते हुए मन में अनेकों भाव जग रहे थे — सुख के –शांति के ,इस विश्वास के हमें इस पवित्र मंदिर तक पहुंचना ही था

अच्छी तरह की गयी ‘सिक्योरिटी चैक’  के बाद हमने मोनैस्ट्री में प्रवेश किया .कड़ाके  की ठंड शुरू हो गयी थी .सूरज देवता छुपने लगे थे ,पर मोनैस्ट्री की सुंदरता मन को कुछ और सोचने ही नहीं दे रही थी .

भवन निर्माण कला के हिसाब से देखें तो बुद्ध भगवान के देश में बनी बाकी सब मोनैस्ट्रीज़   से यह कुछ विशेष अलग न था पर यहॉं के भवन और मूर्तियों का विशालकाय आकार , मंदिर के अंदर की सुकून देने वाली शांति , हवा में फैली अगरबत्ती की सुगंध , मॉन्क्स के लगातार सुनाई देने वाले प्रार्थना के मन्त्र ,दीवारों और छतों पर उकेरे गए चित्र जो भगवान  बुद्ध की कहानियां दर्शाते थे  सब कुछ तो अद्भुत था . वातावरण हम सबको मजबूर कर रहा था नतमस्तक होने के लिए .

प्रसिद्ध ‘ टाइगर्स नॅस्ट’ नlमक गुफा जहाँ ‘गुरु रिंपोशे’ ने पूजा अर्चना की थी , यात्रियों की पहुँच से बाहर थी ,पहुंचने का मार्ग इतना संकरा और ढलान वाला था जहाँ से बस चोटी का किनारा ही नजर आता था, बाकि कुछ नहीं .

मोनैस्ट्री की फोटो लेने की तीव्र इच्छा हो रही थी पर अंदर कैमरा और मोबाइल कुछ भी नहीं ला पाए थे . अपने मन को समझाया कि यहॉं की पवित्रता और सुकून को तो कोई भी कैमरा कैद न कर सकता था .

जल्दी जल्दी पूरी मोनैस्ट्री का चक्कर लगाया और वापिस चलने की तैयारी की , फिर उसी कठिनायों भरे रास्ते से गुजरना था. सच ही उस असंभव लगने वाले रास्ते को हमने 45 मिनट में पार कर लिया और यात्रा शुरू करने के पहले पड़ाव तक वापिस पहुँच गए. थके तो थे पर तीर्थ यात्रा का सुखद अनुभव साथ था .

तक्तसङ्ग के बारे में और जानकारी

पारो में बनी अनेकों और प्रसिद्ध  मोनस्ट्रीज में से तक्तसङ्ग एक है . यह हिमालय पर बसे इस देश की दूसरे नंबर की प्रसिद्ध मोनैस्ट्री है , ऐसा विश्वास है कि ‘गुरु रिंपोशे’ या पद्मसम्भव शेरनी पर सवार होकर  इस गुफा तक पहुंचे थे . यहॉं उन्होंने तीन माह तक तपस्या की, उसके बाद यह मोनैस्ट्री बनी थी .

कहते हैं क़ि भूटान में बुद्ध धर्म की शुरुआत तक्तसङ्ग  से ही  हुईं थी . भारत में जिस प्रकार अमरनाथ और बद्रीनाथ हिन्दुओं के प्रसिद्ध तीर्थ स्थान हैं उसी प्रकार भूटान निवासिओं के लिए यह स्थान प्रसिद्ध तीर्थ स्थान  है .

कैसे पहुंचें

तक्तसङ्ग पारो के उत्तर में २० मिनट की दूरी पर है , पहाड़ की तलहटी तक टैक्सी से पहुँच सकते हैं . उस स्थान से तीन घंटे की चढ़ाई के बाद ऊपर चोटी तक  पहुँचा जा  सकता है और उतराई में डेढ़ से दो घंटे लगते हैं .

भूटान की राजधानी थिम्पू के बाद पारो दूसरा बड़ा शहर है . भूटान का एक इकलौता हवाई अड्डा भी पारो में ही है

चढ़ाई

चढ़ाई के लिए अच्छा बना बनाया रास्ता है पर आधा रास्ता पहुँचने के बाद चढ़ाई खड़ी और कठिन होती जाती है . मार्च के महीने में रास्ता धूल से भरा और फिसलन भरा हो जाता है .

हमने जो चढ़ाई का रास्ता चुना वह छोटा था पर जंगल के बीच से होकर गुजरता था . मोनैस्ट्री की चढ़ाई जॉन अपने जीवन में दूसरी बार कर रहा था , उसी की वजह से यह संभव हो पाया था कि हमने वह रास्ता चुना था . यह रास्ता ज्यादा सुन्दर  ज्यादा आसान था . चित्रोँ में दिखने वाली सुन्दरता से भरा पड़ा था , पर इस रास्ते  पर जाना तभी संभव हो सकता है अगर आपको यहां के पहाड़ी  लोगों  की  तरह जंगल की भूल भुलैया में पहाड़ी बकरियों की तरह चढ़ना आता हो तो .

चढ़ाई कब शुरू करें

अगर आपको जल्दी जल्दी चढ़ने का अभ्यास है तो चढ़ाई के लिए सबसे अच्छा समय सुबह नौ बजे का है . तब आप दो घंटे में रास्ता पार कर सकते हैं . आधे रास्ते में बने कैफ़े में लंच का लुत्फ़ भी उठा सकते हैं . इस कैफ़े में बुफे लंच मिलता है जो तीन बजे तक बंद हो जाता है .

देर से चढ़ाई शुरू करने का एक और भी नुकसान है कि वापिस उतरने के समय आपको अंधेरे में उतरना पड़ सकता है . जंगल घना होने के कारण पेड़ सूरज देवता को जल्दी ही घेर लेते हैं और शाम तीन बजे ही अँधेरा छाने लगता है ,ठण्ड बढ़ने लगती है ,उतरते समय यह कठिनाई पैदा करने लगता है , कभी कभी कुछ स्थानों पर यह खतरनाक साबित हो सकता है .

मोनैस्ट्री में भी एक से दो बजे लंच होने के कारण प्रवेश बंद कर दिया जाता है इसलिए सुबह जल्दी ही चढ़ाई शुरू करना अच्छा रहता है , या कहिये कि चढ़ाई से पहले इन सब बातों का ध्यान रखना अच्छा रहता है .

चढ़ाई के समय क्या साथ रखें -----हमारे सुझाव

पानी ,कुछ खाने के लिए तथा कुछ एनर्जी ड्रिंक साथ रखना अच्छा रहता है . भूटान में मिलने वाला’ रैड बुल’  नामक ड्रिंक जो कफ  सीरप जैसी दिखने वाली छोटी कांच की बोतल में मिलता है , हमको सबसे अच्छा ड्रिंक लगा . यह बिना कंसन्ट्रेटेड और बिना गैस वाला होता है , यह भारत में मिलने वाले रैड बुल से भिन्न ( अलग तरह का ) होता है .

      मंदिर में चढ़ाई जाने वाले वाली भेंट भी अपने साथ ही लेकर चढ़ें . हालाँकि मंदिर और मोनैस्ट्री में नकद राशि भी चढ़ाई जा सकती है ,पर भेंट की वस्तुएं जैसे कि लैंप जलाने के लिए घी , बिस्कुट , चिप्स , फ्रूट जूस आदि वह खूब खुश होकर स्वीकार करते हैं . वहीं के एक मॉन्क के अनुसार भेंट में चढ़ाई गयी वस्तुएँ वे लोग जरुरत मंदों के बीच बाँट देते हैं .

प्रार्थना ध्वज

प्रार्थना ध्वज भी साथ लेकर चलें . रास्ते भर टंगे हुए ये झंडे देखकर आप अचंभित हो जायेंगे और मोनैस्ट्री का द्वार तो इनसे भरा पड़ा है . आप जब भूटान पहुंचते हैं हर स्थान पर टंगे इन झंडों  को देखकर आपका मन स्वयं भी अपना झंडा लगाने को लालायित हो उठता है . तक्तसंग के रास्ते में या चोटी पर पहुंच कर कहीं भी  आपको ये झंडे खरीदने की सुविधा नहीं है , क्योंकि ये हर स्थान पर नहीं बिकते हैं इसलिए पहले से ही खरीदकर अपने साथ ले जाना अच्छा रहता है .

एक छड़ी साथ में

चढ़ाई शुरू करने से पहले ही छड़ी बेचने वाले और टट्टू वालों का जमघट लगा रहता है . पहली बार अपने को स्वस्थ और ताकतवर समझने वाले हमने छड़ी नहीं खरीदी , पर उतराई  के समय हमारे घुटनों  ने जवाब दे दिया . अगर आपके घुटनो में थोड़ी भी तकलीफ है तो छड़ी अवश्य ले लें ,बाद में अफ़सोस न करना पड़ेगा .

चाय की पत्ती

अपने साथ चाय की पत्ती भी लेकर चलें , खास तौर से ताजमहल कम्पनी के टी बैग्स . आप सोचेंगे ताजमहल ही क्यों ? यह आपको यहां आकर ही पता चलेगा कि उसका यहां पर कितना प्रचार और चलन है .

ध्यान रहे

भूटान एक सांस्कृतिक और प्राचीन सभ्यता का केंद्र है .( उस रंगीले , दिव्य और अर्ध विक्षिप्त मनुष्य की याद वाला ). नीकर , आधी बाजू की या बिना बाजू की कमीज पहनकर मोनैस्ट्री और द्ज़ोंग्स में जाने की मनाही है , खास उन स्थानों पर जहाँ सुरक्षा कर्मी तैनात रहते हैं . वे आपको जैकेट से अपने आपको ढक कर रखने पर  बल देंगे . स्त्री पुरूष दोनों पर यह नियम लागू होता है  . इसलिए पूरी पेंट और पूरी बाजू की कमीज पहनकर रखें .

गाइड के बिना तक्तसङ्ग में प्रवेश की अनुमति नहीं है . जॉन हमारे गाइड और साथी दोनों का काम कर रहा था . उसकी वजह से हमारा एक दिन बच गया . आपका ट्रैवेल एजेंट या टूर ऑपरेटर गाइड का प्रबंध कर के देता है . यहां घूमते हुए स्वतंत्र रूप से गाइड की सुविधा मिलती हुई हमारी नजर में नहीं आई .

कैमरा , मोबाइल फ़ोन , खाने का सामान मोनैस्ट्री के अंदर ले जाने की अनुमति नहीं है . मुख्य द्वार पर आपके इस सारे सामान  को सुरक्षित रखने के लिए लॉकर्स की सुविधा उपलब्ध है . छुपाकर इन वस्तुओं को अंदर ले जाने की कोशिश बेकार है क्योंकि आपकी अच्छी तरह तलाशी ली जाती है .

आपको मोनैस्ट्री के अंदर जाकर विश्राम करने या फालतू घूमते रहने की अनुमति भी नहीं है . आप मोनैस्ट्री आराम से घूमें और फिर घूमकर वापिस चले जाएँ वे ऐसे व्यवहार की आप से आशा रखते हैं .

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